मुक्तक – दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

जीवन है एक संग्राम पीछे पग न धारिये। बढ़ते रहो अविराम अपना मन न मारिये। हर पल विजय की आशा और विश्वास को लिए, भजिए हरी का… Read more “मुक्तक – दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।”

पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के रिश्तेदारों सुन लो तुम, इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है। कुछ तारे तो इधर बंटे हैं कुछ तारे हैं बंटे… Read more “पूनम मावस से समझौता करने वाली है।”

गिरती नैतिकता संवरे कब

ओ दिव्य अलौकिक मनुज समाज सुनो अपनी अंर्तमन की आवाज। घूम रहे कुटिल विचार के पंख जब गिरती नैतिकता संवरे कब।। ओ पाश्चात्य संस्कृति में झूल रहा… Read more “गिरती नैतिकता संवरे कब”

डॉ प्रियंका रेड्डी – कब तक सत्ता मौन रहेगी

कब तक सत्ता मौन रहेगी, कब तक प्रसासन के हाथ बंधे रहेंगे क्या बलात्कार करके आरोपी जेल में सिर्फ मुँह छिपाने जाएंगे अब तो थोड़ी शर्म करे… Read more “डॉ प्रियंका रेड्डी – कब तक सत्ता मौन रहेगी”

हिन्दी कविता-आबरू लूटने लगे

अब सरे राह नारी नर भक्षी घूमने लगे | अकेली अबला आबरू निर्भय लूटने लगे | सुना था जंगलो मे जानवर हिंसक रहते है | लूट आबरूअबला… Read more “हिन्दी कविता-आबरू लूटने लगे”

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए । संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥ नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।… Read more “महाराष्ट्र का नाटक”

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए । संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥ नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।… Read more “महाराष्ट्र का नाटक”

औरत के गीले बाल और लोकतंत्र

पॉलिटिकल साइंस के सेमिनार में एक विद्यार्थी का बयान था कि मेरा तो यक़ीन लोकतंत्र पर से सन 1996 में ही उठ गया था.. कहने लगा कि… Read more “औरत के गीले बाल और लोकतंत्र”

माँ के नाम

मुश्किलों से घिरी जब मुझे मेरी जाँ दिखी। मैंनें आँखें बन्द की सामने खड़ी माँ दिखी।। संघर्षों के बादलों ने जब गर्जना शुरू किया मैंने सराय माँगी… Read more “माँ के नाम”